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छह तमाचे राजपूतों के

छह तमाचे राजपूतों के

 

अकबर ने महराणा प्रताप को समझौते के बहुत से प्रस्ताव भेजे। उसने बहुत सी मांगें रखीं। हर बार अकबर एक मांग रखता और महाराणा उसे ठोकर मार देते। आखिरी ठोकर इतनी तेज थी कि अकबर को हल्दी घाटी का युद्ध लड़ना पड़ा। यह उसी हल्दी घाटी और महाराणा के साहस की अनकही कहानी है।

अकबर : मेरे सामने समर्पण कर दो। अपने हाथी मुझे दे दो। मैं जब भी तुमसे कहूं मेरी तरफ से युद्ध लड़ो। अपने राज्य की स्त्रियां मेरे हरम में भेजो। मुझे शुल्क दो, मेरे आगे सिर झुकाओ नहीं तो मैं तुम्हारे ऊपर हमला कर दूंगा।

महाराणा प्रताप : दफा हो जाओ। पहला तमाचा! अकबर : अपने हाथी मुझे दे दो, जब मैं कहूं तो मेरे साथ युद्ध करो, अपने राज्य की स्त्रियों को मेरे हरम में भेजो, मुझे शुल्क दो, मेरे आगे सिर झुकाओ नहीं तो मैं तुम्हारे ऊपर हमला कर दूंगा।

महाराणा : दफा हो जाओ। दूसरा तमाचा!

अकबर : अपने हाथी मुझे दे दो, जब मैं कहूं तो मेरे साथ युद्ध करो, अपने राज्य की स्त्रियों को मेरे हरम में भेजो, मुझे शुल्क दो, मेरे आगे सिर झुकाओ नहीं तो मैं तुम्हारे ऊपर हमला कर दूंगा।





महाराणा : दफा हो जाओ। तीसरा तमाचा!

अकबर : अपने हाथी मुझे दे दो, जब मैं कहूं तो मेरे साथ युद्ध करो, अपने राज्य की स्त्रियों को मेरे हरम में भेजो, मुझे शुल्क दो, मेरे आगे सिर झुकाओ नहीं तो मैं तुम्हारे ऊपर हमला कर दूंगा।

महाराणा : दफा हो जाओ। चौथा तमाचा!


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अकबर : अपने राज्य की स्त्रियां मेरे हरम में भेजो। मेरे सामने झुको नहीं तो मैं तुम्हारे ऊपर हमला कर दूंगा।

महाराणा: दफा हो जाओ। पांचवा तमाचा!

अकबर : मेरे सामने सिजदा करो।

महराणा : दफा हो जाओ। छठां तमाचा!

फिर हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। अकबर की बाकी की जिंदगी हर रात अपनी लुंगी गीली करते हुए निकली। मेवाड़ ने मुग़ल सल्तनत के इतने संसाधन चूस लिए कि मुग़ल सल्तनत में एक के बाद एक विद्रोह होते गए। इस अफरा-तफरी में इन हमलावरों का शाही खानदान आपस में टूट गया। आज मुग़ल खानदान के वंशज भिखारियों के रूप में भारत में फैले हुए हैं और उनकी इस हालत के लिए एक दूसरे के बाप दादाओं को दोष देते हैं।

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